﻿ग़ज़लुल-ग़ज़लात.
1.
सुलेमान की ग़ज़लुल-ग़ज़लात। 
वह मुझे अपने मुँह से बोसे दे, क्योंकि तेरी मुहब्बत मै से कहीं ज़्यादा राहतबख़्श है। 
तेरी इत्र की ख़ुशबू कितनी मनमोहन है, तेरा नाम छिड़का गया महकदार तेल ही है। इसलिए कुँवारियाँ तुझे प्यार करती हैं। 
आ, मुझे खींचकर अपने साथ ले जा! आ, हम दौड़कर चले जाएँ! बादशाह मुझे अपने कमरों में ले जाए, और हम बाग़ बाग़ होकर तेरी ख़ुशी मनाएँ। हम मै की निसबत तेरे प्यार की ज़्यादा तारीफ़ करें। मुनासिब है कि लोग तुझसे मुहब्बत करें। 
ऐ यरूशलम की बेटियो, मैं स्याहफ़ाम लेकिन मनमोहन हूँ, मैं क़ीदार के ख़ैमों जैसी, सुलेमान के ख़ैमों के परदों जैसी ख़ूबसूरत हूँ। 
इसलिए मुझे हक़ीर न जानो कि मैं स्याहफ़ाम हूँ, कि मेरी जिल्द धूप से झुलस गई है। मेरे सगे भाई मुझसे नाराज़ थे, इसलिए उन्होंने मुझे अंगूर के बाग़ों की देख-भाल करने की ज़िम्मादारी दी, अंगूर के अपने ज़ाती बाग़ की देख-भाल मैं कर न सकी। 
ऐ तू जो मेरी जान का प्यारा है, मुझे बता कि भेड़-बकरियाँ कहाँ चरा रहा है? तू उन्हें दोपहर के वक़्त कहाँ आराम करने बिठाता है? मैं क्यों निक़ाबपोश की तरह तेरे साथियों के रेवड़ों के पास ठहरी रहूँ? 
क्या तू नहीं जानती, तू जो औरतों में सबसे ख़ूबसूरत है? फिर घर से निकलकर खोज लगा कि मेरी भेड़-बकरियाँ किस तरफ़ चली गई हैं, अपने मेमनों को गल्लाबानों के ख़ैमों के पास चरा। 
मेरी महबूबा, मैं तुझे किस चीज़ से तशबीह दूँ? तू फ़िरौन का शानदार रथ खींचनेवाली घोड़ी है! 
तेरे गाल बालियों से कितने आरास्ता, तेरी गरदन मोती के गुलूबंद से कितनी दिलफ़रेब लगती है। 
हम तेरे लिए सोने का ऐसा हार बनवा लेंगे जिसमें चाँदी के मोती लगे होंगे। 
जितनी देर बादशाह ज़ियाफ़त में शरीक था मेरे बालछड़ की ख़ुशबू चारों तरफ़ फैलती रही। 
मेरा महबूब गोया मुर की डिबिया है, जो मेरी छातियों के दरमियान पड़ी रहती है। 
मेरा महबूब मेरे लिए मेहँदी के फूलों का गुच्छा है, जो ऐन-जदी के अंगूर के बाग़ों से लाया गया है। 
मेरी महबूबा, तू कितनी ख़ूबसूरत है, कितनी हसीन! तेरी आँखें कबूतर ही हैं। 
मेरे महबूब, तू कितना ख़ूबसूरत है, कितना दिलरुबा! सायादार हरियाली हमारा बिस्तर 
और देवदार के दरख़्त हमारे घर के शहतीर हैं। जूनीपर के दरख़्त तख़्तों का काम देते हैं। 
